أبيتِ اللعن
أبيتِ اللعن
|
وعذراً،زدتُ
زلاتي
|
|
أبيتِ اللعن
مولاتي
|
|
صعودي وانحداراتي
|
|
وغضّي الطرفَ
غافرةً
|
|
قرابيني عذاباتي
|
|
فحسبي أنني زمنٌ
|
|
وصمتي من خطيئاتي
|
|
هدوئي لا يناسبني
|
|
تساهرني مراراتي
|
|
إذا ما البوحُ
خاتلني
|
|
ضياعي وانكساراتي
|
|
وأيامي تقاسمني
|
|
أمامي في عجالاتي
|
|
أكابرُ دافعاً
عمري
|
|
غُلويّ في
جساراتي
|
|
يخبئ حزنه عني
|
|
***
|
|
وعفواً عن
خساراتي
|
|
أبيتَ اللعن يا
وطني
|
|
حنيني واحتمالاتي
|
|
عقودي لا تبادلني
|
|
تباعدها سماواتي
|
|
وأحلامي تراوغني
|
|
تعمَّقَ
بانكفاءاتي
|
|
ونزفي زاد من جرح
|
|
تشظَّيها
اعتباراتي
|
|
فلولي إن تطاوعني
|
|
تُجَمِّعُها
اصطباراتي
|
|
ألملمها تفارقني
|
|
تهتَّكَ في
انتظاراتي
|
|
ولي في أمتي أملٌ
|
|
تهلُّ بوعدها
الآتي
|
|
أداري خيبتي حتى
|
|
***
|
|
وهاك ذي
اعترافاتي:
|
|
أبيتِ اللعن يا
أمي
|
|
فأغوينا الغوايات
|
|
صَبَوْنا منذ أن
كنّا
|
|
بدأنا بالنهايات
|
|
وتهنا في مجاهلنا
|
|
وعدنا للبدايات
|
|
فحادتْ دربُنا
عنّا
|
|
ويَرْضَعُ من
معاناتي
|
|
يعاقرُ همُّنا
همّاً
|
|
وأولدُ في
احتضاراتي
|
|
يداوي جرحنا
جرحاً
|
|
يفلُّ جموحه
العاتي
|
|
يجالد موتنا
موتاً
|
|
ونحيا في
المخاضاتِ
|
|
لنبعث في خنادقنا
|
|
***
|
|
تسلّى بالرسالاتِ
|
|
أبيتَ اللعن
ياوطناً
|
|
وهدباً من
إضاءاتي
|
|
أعارَ الشمس
طلعتها
|
|
بأشعاري وآياتي
|
|
ووشَّى ليل
غيبتها
|
|
وما معنى
القداسات
|
|
فأعطى الكَوْنَ
نكهته
|
|
بفيضٍ من هداياتي
|
|
فأسقاني
وأَسْكَرهُ
|
|
فدائي واستحالاتي
|
|
قليلٌ فيك يا
وطني
|
|
عهودٌ من حكاياتي
|
|
رحابُك زينةُ
الدنيا
|
|
***
|
|
قبولاً
لاعتذاراتي
|
|
أبيتُ اللعن لا
أبغي
|
|
كفافي دمع
كِلْماتي
|
|
ولا أرضى بأن
أحيا
|
|
كفاني ذلَّ
خيباتي
|
|
شموخي رافعاً
رأسي
|
|
توالي عصف هبّاتي
|
|
وهنّاتي يداويها
|
|
خلاصي في
اعتراضاتي
|
|
ممانعتي توحّدني
|
|
قيامي في
انتفاضاتي
|
|
عنادي سرّ ملحمتي
|
|
بأوثانِ
استكاناتي
|
|
وزادي همةٌ كفرتْ
|
|
تخلَّى عن
خياراتي
|
|
خلعتُ كبيرها لما
|
|