|
|
كفى يا قلبُ
يغريكَ المسيرُ
|
|
ولا تدري إلى
أينّ المصيرُ
|
|
|
|
أتمضي في صحارى
التّيه سعياً؟
|
|
على الرمضاءِ
يحرُقكَ الهجير
|
|
|
|
فما نلتَ الذي
تبغيه وصْلاً
|
|
كأنكَ للهوى
أبداً أسيرُ
|
|
|
|
سجينَ العشقِ
أضنْتَك الليالي
|
|
وغالْتكَ
البراعمُ والزهور
|
|
|
|
وفارقتَ المتارفَ
والصبايا
|
|
وفي جنحيكَ يشتعل
السعير
|
|
|
|
وكانت حولكَ
الغيدُ العذارى
|
|
وأنت بعرشكِ
العالي أمير
|
|
|
|
وفاتنةٍ تجرُّ
الذيلَ تيهاً
|
|
ويشرق وجهُها
الزاهي النضير
|
|
|
|
تُبادِلكَ
التحيةَ كلَّ صبحٍ
|
|
وطرفُكَ في
محاسِنها قرير
|
|
|
|
يغارُ البدرُ إنْ
هي قد تراءتْ
|
|
ويحسدُ حُسْنَها
النجمُ المنيرُ
|
|
|
|
إذا ابتسْمتْ
تُجمِلّهُا الدراري
|
|
وبارقُ ثغرِهَا
الناديُ يُنيرُ
|
|
|
|
وإن خطرتْ بروضِ
الحبُ تزهو
|
|
خمائلُهُ وينتشر
العبيرُ
|
|
|
|
تحومُ على دروبكِ
كلَّ آنٍ
|
|
وفي لحظاتِ
محترقٍ تغور
|
|
|
|
حمامةُ أيكةٍ في
ظلِّ غصنٍ
|
|
إذا مارمَتُ
صُحبتَها تطير
|
|
|
|
تناديها فتنفرُ
في اعتزازٍ
|
|
فيؤلمكَ التكبرُّ
والغرور
|
|
|
|
تُقلِّبُ صفحةَ
الماضي فتلقى
|
|
أماني العمرِ
تطويها العصور
|
|
|
|
فمأساةُ الهوى في
كل قلبٍ
|
|
جراحاتٌ إلى
الماضي تُشير
|
|
|
|
فواهاً من خرِيفِ
العمرِ يدنو
|
|
لهُ في كلِّ
جارحةٍ نذير
|
|
|
|
وواهاً للشبابِ
إذا تقضَّى
|
|
وحَلَّ مكانَهُ
الشيبُ المرير
|
|
|
|
هي الدنيا
عذاباتٌ توالى
|
|
يُعاني مِنْ
مواجِعها البصير
|
|
|
|
فَعِشْ عمرَ
الهوى طيباً ووعداً
|
|
فقلبكَ للهوى
أبداً سفير
|
|
|
|
وإنْ حطَّ
المشيبُ على النواصي
|
|
وولى الأمسُ
أوجفَّ الغدير
|
|
|
|
فلا تحفلْ بما قد
مرَّ حلماً
|
|
فعمرُ المرءِ في
الدنيا قصير
|
|
|
|
|