|
|
إنْ أكنْ
أنتَ وإنْ أنتَ أنا
|
|
يسمرُ العمرُ
وتخضلُّ المنَى
|
|
|
|
ساحةُ
القلبِ وما أَرحبَها
|
|
إنْ
تولاَّها الهوى واستوطنا
|
|
|
|
ما الذي
تقطفُ لو خاصمتني؟
|
|
بيدرُ
الخصبِ وماضمَّ لنا
|
|
|
|
كوثر الحُبِّ
زَهتْ صحراؤُه
|
|
نيَسنَتْ
وجهاً وطابتْ مُجْتَنى
|
|
|
|
أيها
الهاربُ مِنْ جنَّتِهِ
|
|
آدمُ قبلكَ
أَخطا عدنا
|
|
|
|
راوَدتهُ للهوى فاتنةٌ
|
|
فهوى روحاً
وأبقى بدنا
|
|
|
|
أيّها الغارقُ في حيرتهِ
|
|
أنتَ سرُّ
الكونِ إما كُوِّنا
|
|
|
|
افتح العينَ على آفاقِها
|
|
يالعينٍ
تتناهى أَعيُنا
|
|
|
|
غايةُ في
المنتهى لا تنتهي
|
|
شفَّنا
الوجدُ إليها زمنا
|
|
|
|
فادنُ مني
ضاحكاً مستبشراً
|
|
واتخذْ في
الروحِ مني مسكنا
|
|
|
|
لا تقلْ حسبكَ ما عانيتهَ
|
|
لنْ تراني
في مداه موهنا
|
|
|
|
ثوبُكَ الأَبيضُ للعرسِ ولمْ
|
|
يُخْلَقِ
الثوبُ ليُطْوَى كَفَنَا
|
|
|
|
فانطلق صوبَ المدى أُغنيَّةً
|
|
واقطفِ
النجمَ بريقاً وسنا
|
|
|
|
آيةُ المرءِ
أفانينُ بها
|
|
أورقَ
القلبُ غوىً وازيَّنا
|
|
|
|
فالسماواتُ
العُلى ملعبهُ
|
|
وإذا شاءَ
الغِنَى ازدادَ غِنَى
|
|
|
|
أقربُ
الناسِ إلى خالِقه
|
|
عارفٌ في
نفسهِ ما اختزنا
|
|
|
|
إنها درب
الرضا حاليةٌ
|
|
فاقتربْ
تسعدْ وما أقربنا
|
|
|
|
واتركِ
الصورة واللون وما
|
|
نمنمَ
السِحرُ وعرِّجْ من هنا
|
|
|
|
لغةُ الروحِ
وما أعذبَها
|
|
لوَّح اللهُ
لها واستحسنا
|
|
|
|
يا مُقامَ النفسِ في أَحزانِها
|
|
لم يكن
عيشُكِ أمراً هيِّنا
|
|
|
|
يا جحيماً وثناً أَعبدُه
|
|
حُقَّ لي
ألعن هذا الوثنا
|
|
|
|
إنَّه
الشوطُ الذي نقطعهُ
|
|
أصبحَ
العيشُ به مُمتَهَنا
|
|
|
|
والرصيفُ
المشتهى غيَّبه
|
|
أننا نعبر
فيه وحدَنا
|
|
|
|
موطني حيث استراحتْ مقلتي
|
|
وأراني
ماوجدتُ الموطنا
|
|
|
|
|